रानी मुखर्जी : “उसे हंसना भी होगा, उसे रोना भी होगा..”!
सलिल दलाल  | अपडेटेड: Thursday, Mar 20, 2014 at 07:42 am EST

कल २१ मार्च है और रानी मुखर्जी का जन्मदिन है। रानी का सदा हंसता खिलखिलाता चेहरा उनके व्यक्तित्व को इतने अच्छे से बयां करता है कि उन्हें दर्शकों के दिल की रानी बनते देर नहीं लगी थी। एक समय पर उनकी फ़िल्मों के गीत-संगीत इतने तो लोकप्रिय हुए थे कि कुछ लोगों ने उन्हें नये ज़माने की आशा पारेख कह दिया था। आशा जी की फ़िल्मों की सफलता में गीतों की लोकप्रियता का बडा हिस्सा था, ये तो कौन नहीं जानता? बल्कि उस दौर की हर नायिका के लिए यह कहा जा सकता था। मगर रानी और आशा जी में एक समानता थी उन दोनों की चुलबुली हंसी।
फिर जिस तरह से आशा पारेख, उनके सामने आई प्रथम फ़िल्म ‘गूंज उठी शेहनाई’ का हिस्सा नहीं बन पाई थीं, उसी तरह से रानी भी उन को मिली प्रथम हिन्दी फ़िल्म ‘आ गले लग जा’ का हिस्सा नहीं बन पाई थी। उस चित्र में अंतत: हीरो जुगल हंसराज की नायिका ‘बहन’ उर्मिला बनी थी। पाठकों को ज़रूर याद होगा कि ‘मासूम’ में जुगल और उर्मिला बाल कलाकार के रूप में सौतेले भाई-बहन बने थे! उस समय १९९४ में रानी ने इसलिए उस फ़िल्म को गले नहीं लगाया था कि वे अभिनय के लिए ठीक से तैयार नहीं थी। मसलन तालीमबद्ध नहीं थी।
लिहाजा, एक्टिंग सिखाने के बम्बई में उस समय के सब से बडे गुरु रोशन तनेजा साहब से बाकायदा तालीम ली और फिर ‘राजा की आयेगी बारात’ से अपना करियर प्रारंभ किया। वैसे रानी एस.एन.डी.टी. कालिज से होम सायन्स की स्नातक भी थी। उस फ़िल्म के साथ भी वही हुआ, जो कितनी अभिनेत्रियों के साथ पहले हो चूका था। ‘राजा की आयेगी बारात’ में रानी के साथ अमजद खान के बेटे शादाब खान हीरो थे, जो कि अब कहीं भी दिखते नहीं। ऐसे कुछ पुराने किस्से याद करते चलें तो? लीना चंदावरकर की प्रथम फ़िल्म ‘मन का मीत’ के हीरो कौन थे? सुनिल दत्त के भाई सोम दत्त, जो फिर इक्का दुक्का फ़िल्मों को छोड़ दिखे ही नहीं!
उसी तरह से माधुरी की पहली फ़िल्म ‘अबोध’ के नायक बंगाली अभिनेता तपस पौल थे, जो हिन्दी सिनेमा में फिर कब दिखे हैं? तो माधुरी के साथ इन दिनों ‘गुलाब गैंग’ में रंग जमाने वाली जुही के ‘सल्तनत’ में प्रथम नायक शशि कपूर के बेटे करन कपूर थे, जो भी नहीं चल पाये थे। उन दोनों की एक ज़माने की स्पर्धक मनीषा कोईराला के पहले हीरो ‘सौदागर’ में विवेक मुश्रान थे। उनका भी अता-पता कहां है? तो तबु के प्रथम हीरो ‘प्रेम’ में संजय कपूर थे, जो भी कभी उतने सफल नहीं हुए जितनी तबु। खुद रानी की चचेरी बहन काजोल ने अपना करियर ‘बेखुदी’ से आरंभ किया था, जिस के मुख्य कलाकार कमल सदाना थे। कमल भी अपने परिवार में हुए एक हादसे के बाद फ़िल्मी बादलों में कब के गुम हो चूके हैं। रानी को पहली अच्छी सफलता आमिर खान के साथ आई ‘गुलाम’ से मिली थी। मगर उस में भी रानी के लिए एक बडा झटका छुपा हुआ था।
‘गुलाम’ पूरी हो जाने के बाद जब डबींग का स्मय आया तब निर्देशक विक्रम भट्ट को रानी की आवाज़ में वो पतला स्वर नहीं सुनाई दिया जो नायिकाओं से अपेक्षित होता था, अभी भी होता है। इस लिए उनके संवादों को डब करवाया गया। किसी भी अभिनेत्री के लिए ये बडा झटका साबित हो सकता था। रानी के लिए ज्यादा हिलाने देने वाली बात इस लिए भी थी कि उनकी माताजी क्रिश्ना देवी खुद एक गायिका रह चूकी थीं । मगर रानी के बेहतरीन अभिनय का कमाल देखिए कि, एक समय पर टूटती कही जाने वाली, वही आवाज़ आज रानी की पहचान है! ‘गुलाम’ के गानों में सबसे लोकप्रिय हुआ था आमिर खान का गाया एक गीत,“ए क्या बोलती तूं ?”
उस गीत “आती क्या खंडाला?” से रानी की किस्मत चमकी और फिर तो पॉप्युलर गानों की जैसे उनकी लाटरी ही लग गई! आज उनके जन्म दिन पर हम इस छोटे से आलेख में सिर्फ कुछ ही गीतों को याद कर सकेंगे और अपेक्षा करेंगे कि पाठक यहाँ छूटे गीतों को भी याद करके रानी को जन्मदिन की शुभकामनाएं अभिव्यक्त करेंगे। हमारी इस सूची में सबसे ऊपर है हमारा बेहद चहिता गाना, ‘बंटी और बबली’ का। जी नहीं, “कजरारे...” तो ऐश्वर्या का गाना था। हमारी मुराद तो रानी और अभिषेक पर फ़िल्माए गए इस गीत पर है, “चुप चुप के चुप चुप के चोरी से चोरी...”। ज़ाहिर है, शब्दों की बुनाई पसंद के पीछे बड़ा कारण है। प्रिय शायर गुलज़ार लिखते हैं, “देखना मेरे सर से आसमां उड़ गया है, देखना आसमां के सिरे खुल गए हैं ज़मीं से...!” गुलज़ार के अलावा किसकी कल्पना में आसमां के छोर धरती से जुडे हो सकते थे? उसमें रानी के हिस्से (महालक्ष्मी अय्यर के स्वर में) ये शब्द आये हैं, “देखना क्या हुआ है, ये ज़मीं बह रही है, देखना पानियों में ज़मीं घूल रही है कहीं....” पानी के बदले ज़मीन को बहता देखना गुलज़ार की कलम से ही हो सकता है।
गुलज़ार का ही लिखा एक अन्य गाना ‘साथीया’ फ़िल्म से  “छलका छलका रे कलसी का पानी...” कभी सुनिएगा। उस में ए. आर. रहमान की धुन की वजह से शायद शब्दों की और अधिक ध्यान नहीं जाता है। मगर शादी के अगले दिन लड़की के लिए गाया जाता यह गीत बड़ी छूने वाली रचना है। वैसे ‘साथीया’ फ़िल्म और उसके सभी गाने ‘कुछ कुछ होता है’ की तरह बेमिसाल ही हैं।
‘कुछ कुछ होता है’ में "कोई मिल गया...” गीत में गिटार लेकर स्टेज पर आती रानी पर हर थियेटर में सीटियां गूंज उठती थी। तो शाहरुख के साथ वाली ‘चलते चलते’ में “तौबा तुम्हारे ये इशारे...” तथा अन्य गानों में रानी को अभिनय करने का अच्छा खासा मौका मिला था और रानी ने अपना लोहा मनवाया था। शाहरुख के साथ की अन्य एक फिल्म ‘पहेली’ तो ऑस्कर अवार्ड के लिए भारत की एन्ट्री भी थी। ऐसा ही अमिताभ बच्चन के साथ भी हुआ।
बच्चन साहब के साथ ‘कभी खुशी कभी गम’ में “से शावा शावा..” पर कदम से कदम मिलाकर खूब नाची और फिर ‘ब्लैक’ में उन्हीं सदी के महानायक के साथ अभिनय में भी ताल मिलाया। ‘ब्लैक’ में एक अंधी और बहरी लड़की की भूमिका में रानी को शायद सबसे अधिक प्रशंसा तथा पुरस्कार मिले। उनके अभिनय को सबने ‘वीर-जारा’ जैसी व्यावसायिक रूप से अति सफल फ़िल्म में माना और ‘नो वन किल्ड जेसिका’ जैसी आलोचकों की पसंद की कृति में भी। उन्हें गोविंदा के साथ “चलो इश्क लडाएं.... चलो इश्क लडाएं....” गाते देखो या ‘नायक...’ में अनिल कपूर के संग “चलो चलें मितवा इन ऊंची नीची राहों में...” रानी अपना अलग ही जलवा बिखेरती है। उन्हें और सैफ़ अली खान को ‘हम तुम’ का शिर्षक गाना “सांसो को सांसो में ढलने दो ज़रा...” गाते देखो या ‘तारा रम पम’ का “हेय श्योना, हेय श्योना...” तो लगेगा कि वो शहरी लडकी के रोल्स में अच्छी लगेगी। फिर ‘पहेली’ के किसी गाने में अथवा तो ‘लागा चुनरी में दाग’ के मज़ेदार गीत “हम तो ऐसे हैं भैया...” में बनारस के गुण गाते देखो तब भी उतनी ही सोहती है।
उनकी निज़ी ज़िंदगी में ‘यशराज’ के कर्ता-धर्ता कहे जाते आदित्य चोप्रा के साथ के बारे में अटकलें हमेशा से लगती रही हैं। कभी उन दोनों की शादी दिवाली के बाद होने वाली होती है, कभी वेलेन्टाईन डे पर। लेकिन हर बार “तारीख पे तारीख...” होती रहती है। १९७८ में २१ मार्च के दिन जन्मी रानी अगली सालगिरह तक विवाह के बंधन में बंध जायेगी? या फिर उन्हें भी अपनी एक फ़िल्म ‘हर दिल जो प्यार करेगा’ का गाना सच्चा लगता रहेगा, “उसे हंसना भी होगा, उसे रोना भी होगा... हर दिल जो प्यार करेगा’’!



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