‘कश्मीर की कली’…“तारीफ़ करुं क्या उस की, जिसने तुम्हें बनाया…”
सलिल दलाल  | अपडेटेड: Thursday, Apr 17, 2014 at 02:57 pm EST

अप्रैल के महीने में ‘आराधना’ जैसी सुपर हीट फ़िल्म के निर्देशक शक्ति सामंता की याद ताज़ा हो जाती है; क्योंकि २००९ के अप्रैल माह में ही उनका निधन हो गया था। उनकी फ़िल्मों का संगीत अपने दौर का अविस्मरणीय म्युझिक हुआ करता था। हिन्दी फिल्म संगीत का एक वो ज़माना भी था, जब एक फिल्म के पूरे के पूरे गाने कर्णप्रिय और सभी लोकप्रिय भी हुए हों। केसेट और सीडी बनानेवाली कंपनीयां और रेकार्डिंग करने वाले व्यापारी ऐसे जोड मिलाते कि एक साथ दो पाप्युलर फिल्मों के गाने एक कसेट में हों। जैसे कि एक ही केसेट में राजकपूर और शंकर जयकिशन की फिल्में ‘आवारा’ और ‘श्री ४२०’ होतीं थीं तो कभी ‘जिस देश में गंगा बहती है’ के साथ ‘संगम’ के गाने होते थे। कोइ ‘लावारिस’ और ‘मुकद्दर का सिकन्दर’ को एक साथ करता, कहीं ‘आराधना’ के साथ ‘कटी पतंग’ मिल जाती और कहीं ‘मिलन’ के साथ ‘आये दिन बहार के’ का मिलाप कर लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल की धूनें एक सीडी में देते थे।

उन दिनों के मुकाबले आज तो तकनीकी हिसाब से इतनी अच्छी प्रगति हुई है कि गायक मुकेश ने अपने करियर में गाये सभी करीब ९०० गाने शायद एक ही डीवीडी में समा जाय! इस लिये अब तो ऐसे मेल-मिलाप करने की आवश्यकता ही नहीं होती होगी। सच पूछीये तो अब इस की ज़रूरत भी नहीं है। मगर आज की ‘मेहफिल’ में बात ‘कश्मीर की कली’ के एल्बम की करनी है, जो शक्ति सामंता के साथ साथ उस फिल्म से जुडे शम्मीकपूर, शर्मिला टेगोर, संगीतकार ओ.पी. नैयर, गीतकार एस.एच. बिहारी, गायक महंमद रफी और गायिका आशा भोंसले हर कलाकार की भी एक अविस्मरणीय कलाकृति के रूप में आज भी जाना जाता है।
  
मगर फिर भी आश्चर्य की बात ये है कि जब फिल्म की तैयारी हो रही थी, तब हीरो शम्मीकपूर की पहली पसंद उस समय के नंबर वन संगीतकार शंकर जयकिशन थे। शम्मीकपूर को लेकर निर्माता शक्ति सामंता ने ’कश्मीर की कली’ से पहले की अपनी फिल्म ‘चाइना टाउन’ बनाई थी और उस में रवि जैसे धूनों के हिसाब से सौम्य माने जानेवाले म्युझिक डीरेक्टर से “बार बार देखो हज़ार बार देखो….” जैसा डान्स का बेहतरीन गाना कम्पोज़ करा सके थे। इस लिये शक्ति दा की संगीत की परख और पसंद दोनों निर्विवाद थीं।

फिर जब ‘ओ.पी.’ के साथ बैठक हुई, तब उन्हों ने एक से एक दो–पांच नहीं तीस बढिया धूनें सुनाई और हीरो भी सहमत हो गये। इसी तरह से शक्ति सामंता की पहली दरखास्त में फिल्म की हीरोइन भी शर्मिला टैगोर कहां थीं? उन्हों ने साधना या तो वहीदा रेहमान को लेने का मन बनाया था। परंतु, अपनी पहली कलर फिल्म के लिये उन्हों ने कश्मीर का लोकेशन चुना था। इस लिये जो भी नायिका का रोल करें उन्हें एक साथ ३० से ३५ दिन की तारीखें देना आवश्यक होता था। उस समय की उन की व्यस्तता को देखते हुए साधना या वहीदा जी किसी के लिये वह संभव नहीं था।

उन्हीं दिनो एक बंगाली सामयिक में शक्ति दा ने शर्मिला जी की तस्वीर देखी और यह भी देखा कि विख्यात निर्देशक सत्यजीत राय ने भी उन्हें पसंद किया था। तब उन के माता पिता से संपर्क किया गया और ‘कश्मीर की कली’ के लिये अनुबंध किया गया। परंतु, शर्मिला जी के मामले में एक मुश्किल होती थी उन की शारीरिक ऊंचाई की। क्यूं कि शम्मीकपूर उन से कद में काफी लम्बे थे। उस का उपाय किया गया । हीरो से निकट दिखाने के लिये शर्मिला जी को पथ्थर पर खडा किया जाता और फिर क्लोज़ अप या मीड शोट (कमर तक का शोट) लिया जाता।

यह उपाय “इशारों इशारों में दिल लेने वाले, बता ये हुनर तुने सिखा कहां से…”  जैसे स्टुडीयों में शुट हुए गीत में ज्यादा संभव हुआ। कश्मीर में तो एक एक खुबसुरत शोट के लिये अच्छे मौसम का इन्तजार करना पडता था। इस लिये ३०- ३५ के बदले शुटिंग पूरे ७५ दिन तक चला। अगर शर्मिला जी जैसी नई तारिका नहीं होतीं तो यह संभव न होता। (मगर एक सवाल हरदम होता है कि अगर साधना या वहीदा जी ने इस प्रोजेक्ट के लिये हामी भर दी होती तो क्या शर्मिला जी हिन्दी सिनेमा को मिलतीं?) नायिका की उपलब्धी की वजह से शक्ति सामंता किस मुक्त मन से फिल्मांकन कर पाये हैं वह हर गाने में देखा जा सकता है।

जैसे फिल्म का सब से लोकप्रिय गाना “तारीफ़ करुं क्या उस की… ” ही ले लिजीये। उस के लिये ५० बोट किराये पर लीं थीं। जुनियर आर्टिस्टों का एक ग्रुप बंबई से बुलाया गया था, जो कि उन पर डान्स करता था। गीत के अंत में सारी नौकाएं हीरो और हीरोइन की बोट के इर्द- गिर्द वर्तुल आकार बनाते हैं उस द्रश्य के फिल्मांकन में काफी मेहनत और समय लगा। उस गाने में हर बार ध्रुव पंक्ति “तारीफ़ करुं क्या उस की…” आने पर पर शम्मीकपूर जिस ढंग से अपने शरीर नर्तन कराते हैं, वह किसी भी डान्स मास्टर की किताब में होगा क्या? यही कमाल था ओ.पी. नैयर की डोला देनेवाली धुनों का!

फिल्म के गीतकार एस.एच बिहारी के बेहतरीन गीतों में ‘कश्मीर की कली’ का अंतिम गाना “है दुनिया उसी की ज़माना उसी का, मोहब्बत में जो हो गया हो किसी का…” भी गिना जाता है। क्या बढिया कविता उन्हों ने उस में लिखी है। गौर किजीयेगा इन अल्फ़ाज़ पर….

“है सज़दे के काबिल हर वो दीवाना
कि जो बन गया हो तसवीरे जानां
करो एहतराम उस की दीवानगी का
मोहब्बत में जो हो गया हो किसी का…”

प्यार करने वाले हर इन्सान को इस कदर ऊंचा स्थान देनेवाले यह शब्द हो, ‘ओ.पी’ की मस्त तर्ज हो, रफी साहब की दिल को छु लेनेवाली गायकी हो और शम्मीकपूर का अनोखा अभिनय हो फिर दर्शक को और क्या चाहिये? मगर इस गाने का एक और आकर्षण भी है। शम्मीकपूर के साथ सेक्सोफोन बजाते नजर आते कलाकार भी काफी ध्यान खींचते हैं। कहीं पढा था कि यह वही कलाकार थे जिन्होंने रिकोर्डींग में भी यह वाद्य बजाया था।  (पर्दे पर भी सेक्सोफोन बजानेवाले वह कलाकर बाद में ‘देवदास’ और ‘हम दिल दे चूके सनम’ जैसे एल्बम दे कर अपना विशीष्ठ स्था बनानेवाले संगीतकार इस्माइल दरबार के पिताश्री थे। अलबत्ता, इस जानकारी की पुष्टि होना बाकी। एक बार यह पढा जरुर है।)

मगर अकेले सेक्सोफोन की ही कहां बात है? फिल्म के एक और गीत ‘‘किसी ना किसी से कभी ना कभी, कहीं ना कहीं दिल लगाना पडेगा…” के प्रारंभ में बजाया गया माउथ ओर्गन सुनिये और कश्मीर की हसीन वादीयों के द्रश्य देखीये पांच या दस आने के टिकट में दर्शक के तो वारे न्यारे हो जाते थे! फिर “इशारों इशारों में दिल लेनेवाले..” में सितार के तार हों या फिर “हाये रे हाये कि तेरे हाथ में मेरा हाथ मेरी जां बल्ले बल्ले…” के भांगडा में ढोल की धमाल सुनिये, कहीं भी कच्चा काम नहीं। (किसी ने ठीक ही कहा है इस संगीतकार के बारे में “ओपी की कोपी नहीं!”)

ऐसा ही एक और डान्स सोंग था, “सुभान अल्लाह ओये, हसीं चेहरा ओये…” मगर ओपी साहब का म्युज़िक हो और आशा भोंसले का सोलो गाना न हो ये तो हो ही नहीं सकता था ना? इस फिल्म में भी दो गाने मिले। एक तो “फिर ठेस लगी दिल को…” जो शायद इतना लोकप्रिय नहीं हो पाया था। मगर अन्य गीत “बलमा खुली हवा में,… ओ.पी. और आशा की जोडी का टिपीकल स्कोर था।
कश्मीर की खुली हवा और उपर से गानों में गीतकार एस. एच. बिहारी के शब्द भी कितने खुबसुरत? “तारीफ़ करुं क्या…” के एक अंतरे में हीरोइन की खुबसुरती की प्रशंसा में उन्हों ने लिखा,
हर सुबहा किरन की लाली, है रंग तेरे गालों का
हर शाम की चादर काली, साया है तेरे बालों का
तु बलखाती इक नदिया, हर मौज तेरी अंगडाई,
जो इन मौजों में डूबा, उस ने ही दुनिया पाई….
तारीफ़ करुं क्या उस की, जिस ने तुम्हें बनाया…”

ऐसे शब्द सुनकर यही जुमला शायर समशुल हुदा बिहारी को भी कहने का दिल नहीं करता क्या? फिल्म इन्डस्ट्री में जिन के काम की उतनी कद्र नहीं हुइ, जिन के कि वे हकदार थे ऐसे गीतकारों में एस.एच. बिहारी का भी शुमार होता है। उन के जैसे गीतकार और ‘ओ.पी.’ के लिए हीरो शम्मी कपूर को मनवाने वाले शक्ति सामंता की ‘एन इवनींग इन पेरिस’ हो या ‘सावन की घटा’ अथवा ‘कटी पतंग’ उनकी हर फ़िल्म का असली हीरो  न तो शम्मी कपूर, न मनोज कुमार और ना ही राजेश खन्ना होते थे.... बल्कि संगीत होता था! सोचो ठाकुर!!



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