डब्ल्यूएचओ: वायु प्रदूषण से प्रति वर्ष ७ मिलियन मौतें
London , England ,  United Kingdom , Europe   | अपडेटेड: Wednesday, Mar 26, 2014 at 05:05 am EST

लंदन – मंगलवार को प्रकाशित 'विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ)' की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, हर साल दुनिया भर में वायु प्रदूषण की वजह से लगभग ७ मिलियन लोगों की मौत हो जाती है. इनमें से आधे से ज्यादा लोग घरों के चूल्हों से निकलने वाले धुएं का शिकार होते हैं।
डब्ल्यूएचओ का कहना है कि वायु प्रदूषण आठ में से एक मौत का कारण बनता है और अब यह अकेला सबसे बड़ा पर्यावरणीय खतरा बन चुका है।
इस प्रदूषण के सबसे बड़े जोखिम वे छोटे कण हैं जो हमारे फेफड़ों में गहराई से पैठ कर जाते हैं और परेशानी पैदा करते हैं। वैज्ञानिकों को इस बात का भी संदेह है कि वायु प्रदूषण से दिल में सूजन हो जाती है जिससे गंभीर समस्याएं जैसे कि दिल के दौरे का खतरा पैदा हो जाता है।
डब्ल्यूएचओ के आकलन के अनुसार २०१२ में हुई करीब ४.३ मिलियन मौतें घरों के भीतर पैदा वायु प्रदूषण के कारण हुई थीं। साथ ही २०१२ में तकरीबन ३.७ मिलियन मौतें बाहरी वातावरण के प्रदूषण का परिणाम थीं।
डब्ल्यूएचओ ने यह भी इंगित किया है कि कई लोग बाहरी और भीतरी दोनों तरह के प्रदूषणों का शिकार होते हैं। ये नए आकलन पुराने आंकड़ों के मुकाबले दुगने हैं और नमूनों पर आधारित हैं। आंकड़ों में हुई यह वृद्धि संभवतः स्वास्थ्य प्रभावों को लेकर बेहतर सूचना और सुधरी हुई परीक्षण प्रणाली की वजह से है।
डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट दिखाती है कि विकासशील देशों में पुरुषों की तुलना में महिलाएं वायु प्रदूषण का ज्यादा शिकार होती हैं।
'फैमिली, विमेन एंड चिल्ड्रेन्स हेल्थ' के लिए डब्ल्यूएचओ की असिस्टेंट डाइरेक्टर जनरल, फ्लेविया बस्ट्रियो ने एक वक्तव्य में कहा "गरीब औरतों और बच्चों को घरेलू वायु प्रदूषण की भारी कीमत चुकानी पड़ती है क्योंकि उनका अधिकतर समय घर के धुएं में बीतता है। "
अन्य विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रदूषण के सबसे घातक तत्व को पहचानने के लिए और अधिक शोधों की जरूरत है ताकि इसे नियंत्रित करने के और कारगर मानदंड अपनाए जा सकें।
केली ने कहा कि यह सबसे ज्यादा सरकारों पर निर्भर करता है कि वे कानून बनाकर, बड़े शहरों से ऊर्जा घरों को दूर हटाकर और घरेलू ईंधनों और कोयले की अंगीठियों का विकल्प प्रस्तुत करने जैसे कदम उठाकर इस प्रदूषण पर लगाम लगाए।
उन्होंने कहा कि लोग भीड़-भाड़ वाले समयों के दौरान यात्रा न करके या फिर छोटे रास्तों से जाकर भी इस दमघोंटू धुंए से व्यक्तिगत बचाव कर सकते हैं। बीजिंग और टोक्यो जैसे भारी प्रदूषित शहरों में फेस-मास्क के बढ़ते चलन के बावजूद केली कहते हैं कि उनकी उपयोगिता के बहुत कम हैं।
केली ने कहा, "असली समस्या यह है कि मास्क पहनने से यह संदेश जाता है कि हम प्रदूषित हवा में जिंदा रह सकते हैं। इस प्रदूषण को कम करने के लिए हमें अपनी जीवन शैली में आमूल परिवर्तन करने होंगे। "



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